डेटा सब कुछ नहीं बताता: लापता लड़कियों पर सरकार क्या नहीं दिखाती? | Part 4

सरकार क्या छुपाती है? Missing Girls Data vs Ground Reality | भारत की सबसे बड़ी चुप्पी (Part 4)

सरकार क्या छुपाती है? लापता लड़कियों के आंकड़े बनाम जमीनी सच्चाई (Part 4)

जब भी भारत में लापता लड़कियों और महिलाओं का मुद्दा उठता है, सरकार की तरफ से एक ही जवाब आता है —

“डेटा उपलब्ध है। केस दर्ज हैं। कार्रवाई हो रही है।”

लेकिन अगर सच में सब कुछ इतना साफ, पारदर्शी और प्रभावी होता, तो सवाल यह है —

हर साल लाखों महिलाएं लापता कैसे हो जाती हैं और हजारों कभी वापस क्यों नहीं मिलतीं?

यह Part-4 उसी सवाल का जवाब खोजने की कोशिश है।


आंकड़े दिखाए जाते हैं, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं

सरकारी रिपोर्टों में अक्सर यह बताया जाता है:

  • कितनी लड़कियां लापता हुईं
  • कितनी ट्रेस हो गईं
  • कितनी अभी भी लापता हैं

लेकिन जिन सवालों के जवाब नहीं दिए जाते, वे हैं:

  • Untraced मामलों की फॉलो-अप रिपोर्ट कहां है?
  • 5–10 साल पुराने केस का क्या हुआ?
  • कितनी महिलाएं तस्करी में गईं?
  • कितनी जबरन शादी में धकेली गईं?

सरकारी डेटा “संख्या” दिखाता है, लेकिन “कहानी” नहीं।


NCRB डेटा: जितना बताया जाता है, उतना ही दिखता है

National Crime Records Bureau (NCRB) हर साल “Crime in India” रिपोर्ट जारी करता है।

इस रिपोर्ट में:

  • Missing Women
  • Missing Children

के आंकड़े दिए जाते हैं।

लेकिन NCRB खुद यह स्वीकार करता है कि:

  • यह केवल reported cases हैं
  • जो केस दर्ज नहीं हुए, वे डेटा में नहीं

यानी —

जो थाने तक नहीं पहुंचा, वह कभी लापता माना ही नहीं गया।


कितने केस कभी दर्ज ही नहीं होते?

जमीनी हकीकत यह है कि:

  • ग्रामीण इलाकों में डर
  • गरीब परिवारों में असहायता
  • पुलिस का रवैया

के कारण हजारों परिवार FIR दर्ज ही नहीं करा पाते।

कई बार परिवार को कहा जाता है:

  • “लड़की खुद भाग गई होगी”
  • “दो-चार दिन रुक जाइए”
  • “शादी करके चली गई होगी”

इन 2–3 दिनों में:

  • मोबाइल बंद हो जाता है
  • लोकेशन खत्म हो जाती है
  • ट्रेल टूट जाती है

और फिर —

केस कभी मजबूत बन ही नहीं पाता।


Untraced को आंकड़ों में “कम” क्यों दिखाया जाता है?

यह सबसे संवेदनशील सवाल है।

सरकारी रिकॉर्ड में Untraced केस:

  • अलग से हाईलाइट नहीं किए जाते
  • साल-दर-साल जोड़कर नहीं दिखाए जाते

अगर ऐसा किया जाए, तो यह साफ दिखेगा कि:

भारत में लाखों महिलाएं ऐसी हैं जिनका कोई अता-पता नहीं।

और यह आंकड़ा:

  • सरकार के लिए असहज है
  • प्रशासन के लिए शर्मनाक
  • राजनीतिक रूप से खतरनाक

राज्यों के बीच डेटा का खेल

एक और सच्चाई —

हर राज्य:

  • अपना डेटा अलग तरीके से दर्ज करता है
  • परिभाषाएं अलग होती हैं

कहीं:

  • 18 साल तक लड़की
  • कहीं 16 साल तक

कहीं:

  • “घर छोड़कर गई” को Missing नहीं माना जाता

इससे:

  • National Data कभी पूरी तरह मेल नहीं खाता
  • तुलना मुश्किल हो जाती है

राजनीति और चुप्पी

लापता लड़कियों का मुद्दा:

  • चुनावी भाषणों में नहीं आता
  • डिबेट में नहीं होता

क्योंकि:

  • यह आंकड़ों से जुड़ा है
  • इसमें जवाबदेही चाहिए
  • और समाधान आसान नहीं

यह मुद्दा:

  • नारे नहीं बनता
  • पोस्टर नहीं बनता

इसलिए:

यह धीरे-धीरे फाइलों में दब जाता है।


मीडिया क्या दिखाता है, क्या नहीं?

जब कोई हाई-प्रोफाइल केस होता है:

  • टीवी डिबेट
  • ब्रेकिंग न्यूज़

लेकिन:

  • हजारों सामान्य परिवारों की बेटियां
  • कभी स्क्रीन पर नहीं आतीं

मीडिया भी:

  • डेटा नहीं पूछता
  • Untraced पर फॉलो-अप नहीं करता

धीरे-धीरे:

समस्या “नॉर्मल” हो जाती है।


क्या यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता है?

नहीं।

यह:

  • सामाजिक सोच
  • महिला की स्थिति
  • लैंगिक भेदभाव

का भी परिणाम है।

जब लड़की लापता होती है:

  • उसे शक की नजर से देखा जाता है
  • चरित्र पर सवाल उठते हैं

और यही सोच:

जांच को कमजोर कर देती है।


अगर डेटा सच में पारदर्शी हो जाए तो?

कल्पना कीजिए:

  • हर Untraced केस सार्वजनिक हो
  • 5 साल पुराने केस की रिपोर्ट अनिवार्य हो
  • राज्य-वार जवाबदेही तय हो

तो:

  • सिस्टम पर दबाव बढ़ेगा
  • राजनीतिक इच्छाशक्ति बनेगी

लेकिन:

फिलहाल ऐसा नहीं है।


समाधान क्या सिर्फ कागज़ों में है?

योजनाएं हैं।

  • महिला हेल्पलाइन
  • एंटी-ट्रैफिकिंग यूनिट
  • डिजिटल FIR

लेकिन:

  • जमीनी अमल कमजोर है
  • मानिटरिंग नहीं
  • परिणाम की समीक्षा नहीं

यही वजह है कि:

डेटा हर साल बढ़ता जाता है।


निष्कर्ष (Part 4)

भारत में लापता लड़कियों और महिलाओं का मुद्दा सिर्फ अपराध नहीं —

यह डेटा, सिस्टम और नीयत का संकट है।

सरकार सब कुछ नहीं छुपाती, लेकिन जो नहीं दिखाया जाता —

वही सबसे खतरनाक सच है।

जब तक:

  • Untraced केस सिर्फ संख्या बने रहेंगे
  • और इंसान नहीं माने जाएंगे

तब तक:

यह त्रासदी चलती रहेगी।

यह Part-4 एक सवाल छोड़ता है —

अगर सच्चा डेटा सामने आ जाए, तो क्या सिस्टम जवाब दे पाएगा?


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