15,000 घोंसलों से बदली चेन्नई की फिज़ा: एक साल में कैसे लौटे शहर के गौरैया
न्यूज़ डेस्क | विशेष रिपोर्ट
🔴 एक साल पहले की चिंता, आज की उम्मीद
एक समय था जब भारत के शहरों में सुबह की शुरुआत गौरैया की चहचहाहट से होती थी। लेकिन मोबाइल टावरों, कंक्रीट की इमारतों, प्रदूषण और हरियाली की कमी ने इन नन्हे पक्षियों को शहरों से लगभग गायब कर दिया।
चेन्नई भी इससे अछूता नहीं रहा। कुछ साल पहले तक शहर के कई इलाकों में गौरैया दिखाई देना एक दुर्लभ दृश्य बन चुका था। लेकिन पिछले एक साल में तस्वीर बदलती नजर आई है।
इस बदलाव के केंद्र में है और इसके संस्थापक ।
🟠 कैसे शुरू हुई कूडुगल नेस्ट की कहानी
कूडुगल नेस्ट की शुरुआत एक साधारण सवाल से हुई — “क्या हम शहरों में गौरैया के लिए फिर से जगह बना सकते हैं?”
गणेशन डी ने महसूस किया कि अगर शहरों में गौरैया को सुरक्षित घोंसले और भोजन मिल जाए, तो वे वापस लौट सकती हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने नेस्ट बॉक्स आधारित संरक्षण मॉडल पर काम शुरू किया।
शुरुआत छोटे स्तर पर हुई, लेकिन लोगों की भागीदारी और स्कूलों के सहयोग ने इसे एक जन-आंदोलन का रूप दे दिया।
🟡 15,000 नेस्ट बॉक्स: सिर्फ लकड़ी के डिब्बे नहीं, सीखने के केंद्र
पिछले एक वर्ष में कूडुगल नेस्ट ने तमिलनाडु भर में लगभग 15,000 नेस्ट बॉक्स वितरित किए। ये नेस्ट बॉक्स खास तौर पर स्कूली बच्चों को दिए गए।
इन घोंसलों का उद्देश्य केवल गौरैया को जगह देना नहीं था, बल्कि बच्चों को प्रकृति से जोड़ना भी था।
हर नेस्ट बॉक्स एक “मिनी क्लासरूम” की तरह काम करता है — जहाँ बच्चे गौरैया के व्यवहार, अंडों, बच्चों और उनके संरक्षण को नज़दीक से समझते हैं।
🟢 चेन्नई में दिखने लगा असर
कूडुगल नेस्ट के प्रयासों का असर अब साफ दिखाई दे रहा है। उत्तरी चेन्नई के कई इलाकों में गौरैया की आबादी में लगभग 30 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है।
बालकनी, स्कूल परिसर, गलियों और घरों के आसपास गौरैया फिर से दिखने लगी हैं।
गणेशन कहते हैं — “जब किसी बच्चे की आँखों में यह खुशी दिखती है कि उसके लगाए घोंसले में चिड़िया ने अंडे दिए हैं, तो लगता है कि हमारा प्रयास सफल हो रहा है।”
🔵 शिक्षा और समुदाय: इस मॉडल की असली ताकत
कूडुगल नेस्ट का सबसे मजबूत पक्ष है — समुदाय की भागीदारी।
यह पहल केवल NGO या ट्रस्ट तक सीमित नहीं है। स्कूल, शिक्षक, अभिभावक और स्थानीय लोग — सभी इसका हिस्सा बन चुके हैं।
बच्चों को यह सिखाया जाता है कि छोटे-छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं।
🟣 तकनीक और संरक्षण का मेल
कूडुगल नेस्ट अब तकनीक का भी सहारा ले रहा है।
एक मोबाइल-आधारित बायोडायवर्सिटी मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किया जा रहा है, जिससे छात्र और स्वयंसेवक गौरैया की संख्या और गतिविधियों को रिकॉर्ड कर सकें।
यह डेटा भविष्य में शोध और नीति निर्माण के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है।
🟤 अंतरराष्ट्रीय पहचान और शोध
इस पहल को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है।
कूडुगल नेस्ट को ब्रिटिश ऑर्निथोलॉजिस्ट्स यूनियन द्वारा आयोजित सम्मेलन में अपनी पहल प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया गया है।
इसके अलावा, शहरी गौरैया पर आधारित एक शोध पत्र Biotropica जर्नल में प्रकाशित हुआ, जिसमें यह बताया गया कि शहरी जीवन गौरैया के लिए कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
⚫ कॉरपोरेट सहयोग से बढ़ा दायरा
चेन्नई विलिंगडन कॉरपोरेट फाउंडेशन, SurveySparrow, Genesys और Lennox जैसी कंपनियों ने इस पहल को सहयोग दिया।
इस सहयोग से कूडुगल नेस्ट अब दूसरे शहरों में भी अपने मॉडल को लागू करने की तैयारी में है।
🔴 प्रभाव (Impact): सिर्फ पक्षी नहीं, सोच भी बदली
इस पहल का असर केवल गौरैया तक सीमित नहीं है।
- बच्चों में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी बढ़ी
- शहरी जैव विविधता पर चर्चा शुरू हुई
- लोगों ने अपने घरों और बालकनियों को प्रकृति-अनुकूल बनाना शुरू किया
आज चेन्नई में गौरैया की वापसी यह साबित करती है कि अगर समाज चाहे, तो विकास और प्रकृति साथ-साथ चल सकते हैं।
🟢 आगे की राह
कूडुगल नेस्ट का सपना है कि भारत के हर शहर में गौरैया फिर से आम दृश्य बनें।
गणेशन और उनकी टीम मानते हैं कि यह सिर्फ एक पक्षी को बचाने की कहानी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति से जोड़ने की कोशिश है।
निष्कर्ष:
चेन्नई में गौरैया की वापसी हमें यह सिखाती है कि
पर्यावरण संरक्षण कोई बड़ा या महंगा काम नहीं,
बल्कि सही सोच और सामूहिक प्रयास से संभव बदलाव है।

0 Comments