ज़ोमैटो अरबों कमा रहा है, डिलीवरी बॉय भूखा क्यों ? कौन जवाब देगा सरकार भी आंखें मूंदे बैठी है ।

स्क्रीनशॉट के ज़रिये समझिए: क्या जोमैटो डिलीवरी बॉय के साथ सही हिसाब हो रहा है?

स्क्रीनशॉट के ज़रिये समझिए: क्या जोमैटो डिलीवरी बॉय के साथ सही हिसाब हो रहा है?

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले डिलीवरी बॉय पूरी तरह ऐप में दिखाए गए नियमों और ऑफर्स पर भरोसा करके काम करते हैं। जोमैटो जैसे बड़े प्लेटफॉर्म पर हर ऑफर और भुगतान ऐप के माध्यम से ही तय होता है। ऐसे में अगर ऐप में दिखाया गया हिसाब और वास्तविक कमाई में अंतर दिखाई दे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

नीचे दिए गए स्क्रीनशॉट जोमैटो ऐप के “ऑफर” और “कमाई” सेक्शन से लिए गए हैं। इनमें साफ़ लिखा है कि आज के लिए प्रति ऑर्डर ₹15 अतिरिक्त देने का ऑफर मौजूद है। इस ऑफर के आधार पर डिलीवरी बॉय काम करता है और ऑर्डर पूरे करता है।

साधारण गणित:
₹15 × 10 ऑर्डर = ₹150

अगर कोई डिलीवरी बॉय इस ऑफर के दौरान 10 ऑर्डर पूरा करता है, तो उसे ₹150 अतिरिक्त मिलने चाहिए। लेकिन कमाई वाले स्क्रीनशॉट में जो राशि दिखाई देती है, वह ₹150 नहीं बल्कि ₹135 है। यहीं से असली सवाल शुरू होता है।

यह अंतर क्यों दिखाई दे रहा है?

यह लेख किसी कंपनी पर सीधा आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि भुगतान प्रणाली में पारदर्शिता की कमी को दिखाने के लिए है। अगर किसी तरह की कटौती, शर्त या सीमा है, तो उसे साफ़ और स्पष्ट रूप से डिलीवरी बॉय को बताया जाना चाहिए।

डिलीवरी बॉय के पास न तो पूरा हिसाब समझने का समय होता है और न ही सवाल पूछने की कोई आसान व्यवस्था। वह ऐप पर दिख रही जानकारी पर भरोसा करके काम करता है। ऐसे में भुगतान में अंतर होना उसके लिए आर्थिक नुकसान और मानसिक दबाव दोनों पैदा करता है। यह मुद्दा सिर्फ एक दिन या एक ऑर्डर का नहीं है, बल्कि उस भरोसे का है जिस पर लाखों डिलीवरी बॉय रोज़ काम करते हैं।

स्क्रीनशॉट के ज़रिये समझिए: क्या डिलीवरी बॉय के साथ सही हिसाब हो रहा है?

नीचे दिए गए स्क्रीनशॉट्स डिलीवरी ऐप के “ऑफर” और “कमाई” सेक्शन के हैं। इनमें साफ़ लिखा है कि कंपनी प्रति ऑर्डर ₹15 अतिरिक्त देने का दावा कर रही है।

अगर कोई डिलीवरी बॉय इस ऑफर के दौरान 10 ऑर्डर पूरा करता है, तो सामान्य गणित के अनुसार उसे:

₹15 × 10 ऑर्डर = ₹150

लेकिन तीसरे स्क्रीनशॉट में जो वास्तविक कमाई दिखाई गई है, वह ₹150 नहीं बल्कि ₹135 है।

अब सवाल उठता है — बाकी ₹15 कहाँ गए?

यह कोई बहुत बड़ी रकम नहीं लग सकती, लेकिन एक गरीब डिलीवरी बॉय के लिए हर रुपया मायने रखता है। जब कंपनी खुद प्रति ऑर्डर ₹15 अतिरिक्त देने की बात लिखित रूप में दिखा रही है, तो पूरा भुगतान क्यों नहीं दिखाई देता?

क्या यह:

  • किसी शर्त का मामला है, जो साफ़ तौर पर नहीं बताई गई?
  • तकनीकी कटौती है, जिसकी जानकारी पहले नहीं दी गई?
  • या फिर ऐसा सिस्टम है जिसमें डिलीवरी बॉय को पूरा हिसाब समझ ही नहीं आता?
मुद्दा पैसे से ज़्यादा पारदर्शिता का है।
अगर नियम साफ़ हैं, तो कटौती भी साफ़ दिखनी चाहिए।

डिलीवरी बॉय न तो अकाउंटेंट है और न ही उसके पास इतना समय होता है कि वह हर ऑर्डर का हिसाब बैठाए। वह कंपनी पर भरोसा करता है — और यही भरोसा अक्सर टूटता नज़र आता है।

इसी भरोसे के टूटने को कई डिलीवरी बॉय शोषण मानते हैं, क्योंकि सवाल पूछने का न तो कोई आसान तरीका है और न ही सुनवाई की कोई ठोस व्यवस्था।

यह आरोप नहीं, सवाल है

यह लेख किसी व्यक्ति या कंपनी को दोषी ठहराने का दावा नहीं करता, बल्कि उन सवालों को सामने लाता है जो ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले डिलीवरी बॉय रोज़ महसूस करते हैं।

अगर कंपनी का सिस्टम पूरी तरह साफ़ है, तो इन अंतर को स्पष्ट रूप से समझाया जाना चाहिए। क्योंकि जब मेहनत पूरी है, तो भुगतान अधूरा क्यों?

यही सवाल आज हज़ारों डिलीवरी बॉय के मन में है — और शायद यही सबसे बड़ा मुद्दा है।

₹15 अतिरिक्त प्रति ऑर्डर का वादा, ₹135 की हकीकत: डिलीवरी बॉय के साथ पूरा हिसाब क्यों नहीं चलिए स्क्रीनशॉट में समझते हैं ?

स्क्रीनशॉट 1: कंपनी द्वारा प्रति ऑर्डर ₹15 अतिरिक्त देने का दावा, जो ऐप में साफ़ दिखाई देता है।

स्क्रीनशॉट 2: तय समय में पूरे किए गए ऑर्डर और गिग्स, जिनके आधार पर अतिरिक्त भुगतान मिलना चाहिए था l

स्क्रीनशॉट 3: 10 ऑर्डर पूरे करने के बाद वास्तविक अतिरिक्त कमाई ₹150 की जगह ₹135 दिखाई गई।

सरकार और विभागों की भूमिका

गिग वर्कर्स की संख्या देश में लगातार बढ़ रही है, लेकिन उनके भुगतान और अधिकारों को लेकर स्पष्ट नियम अब भी कमजोर हैं। सरकार और श्रम से जुड़े विभागों को ऐसे मामलों पर ध्यान देना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी डिलीवरी बॉय के साथ भुगतान को लेकर भ्रम या नुकसान न हो।

नोट: यह लेख ऐप में दिखाई गई जानकारी और स्क्रीनशॉट्स के आधार पर भुगतान में पारदर्शिता की मांग करता है। इसका उद्देश्य किसी पर कानूनी आरोप लगाना नहीं, बल्कि सिस्टम में सुधार की आवाज़ उठाना है।

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