UNESCO ने Deepavali (दिवाली) को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया — भारत के लिए एक गर्व का पल
भारत के सांस्कृतिक इतिहास में 10 दिसंबर 2025 का दिन स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। UNESCO की 'Representative List of the Intangible Cultural Heritage of Humanity' में Deepavali—जिसे हम प्यार से दिवाली कहते हैं—को आधिकारिक रूप से स्थान दिया गया है। यह केवल एक त्योहार की मान्यता नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति, भारतीय परंपराओं और 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' (अंधकार से प्रकाश की ओर) के शाश्वत संदेश की वैश्विक जीत है। आइए विस्तार से समझते हैं कि इस ऐतिहासिक कदम के क्या मायने हैं।
दिवाली: सिर्फ एक त्योहार नहीं, एक भावना
दिवाली, जिसका शाब्दिक अर्थ है 'दीपों की अवली' (पंक्ति), भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। यह कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है, जो साल की सबसे अंधेरी रात होती है। लेकिन भारत के लोग इस अंधेरी रात को लाखों दीयों की रोशनी से जगमगाकर यह संदेश देते हैं कि चाहे अंधेरा कितना भी घना क्यों न हो, एक छोटे से दीये का प्रकाश उसे हराने के लिए काफी है।
यह पर्व बुराई पर अच्छाई, अज्ञान पर ज्ञान और निराशा पर आशा की विजय का प्रतीक है। घरों की साफ-सफाई से लेकर रंगोली सजाने तक, और नए कपड़ों से लेकर मिठाइयों के आदान-प्रदान तक, दिवाली सामाजिक समरसता का एक अद्भुत उदाहरण पेश करती है।
पौराणिक महत्व: क्यों मनाई जाती है दिवाली?
UNESCO की मान्यता के पीछे दिवाली की गहरी ऐतिहासिक और पौराणिक जड़ें भी हैं। भारत के अलग-अलग हिस्सों में इसे मनाने के अलग-अलग कारण हैं, जो इसे 'विविधता में एकता' का प्रतीक बनाते हैं:
- भगवान राम की वापसी: उत्तर भारत में मान्यता है कि 14 वर्ष के वनवास और रावण का वध करने के बाद जब भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे, तो नगरवासियों ने घी के दीये जलाकर उनका स्वागत किया था।
- समुद्र मंथन और माँ लक्ष्मी: पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। इसलिए व्यापारी वर्ग और गृहस्थ इस दिन धन और समृद्धि के लिए लक्ष्मी-गणेश का पूजन करते हैं।
- नरकासुर वध: दक्षिण भारत में, यह दिन भगवान कृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर के वध की खुशी में मनाया जाता है, जो बुराई के अंत का प्रतीक है।
- पांडवों की वापसी: महाभारत के अनुसार, पांडव भी अपने अज्ञातवास के बाद इसी दिन हस्तिनापुर लौटे थे।
अन्य धर्मों में दिवाली का महत्व
दिवाली की सुंदरता यह है कि यह सिर्फ हिंदुओं तक सीमित नहीं है। UNESCO ने भी इसके समावेशी (Inclusive) स्वरूप की सराहना की है:
- जैन धर्म: जैन मान्यता के अनुसार, इसी दिन 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर को मोक्ष (निर्वाण) की प्राप्ति हुई थी।
- सिख धर्म (बंदी छोड़ दिवस): सिख इतिहास में यह दिन बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी, ग्वालियर के किले से 52 राजाओं को मुक्त कराकर अमृतसर पहुँचे थे। स्वर्ण मंदिर की सजावट इस दिन देखते ही बनती है।
- बौद्ध धर्म: कुछ बौद्ध संप्रदायों में भी सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार करने के दिवस के रूप में इसे याद किया जाता है।
UNESCO में शामिल होना क्यों मायने रखता है?
किसी भी सांस्कृतिक धरोहर का UNESCO की सूची में आना उसे 'Global Brand' बना देता है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब दिवाली सिर्फ भारत का त्योहार नहीं, बल्कि पूरी मानवता की विरासत है।
- वैश्विक पहचान: दुनिया भर के लोग अब दिवाली के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व को और गहराई से जानेंगे।
- सांस्कृतिक पर्यटन (Tourism): विदेशी पर्यटकों की रुचि भारत आने में बढ़ेगी, जिससे हमारे टूरिज्म सेक्टर को बड़ा बूस्ट मिलेगा।
- संरक्षण: दिवाली से जुड़ी लुप्त होती लोक कलाओं और रीतियों को संरक्षित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय फंड और सहयोग मिल सकेगा।
कुम्हारों और स्थानीय कारीगरों के लिए संजीवनी
इस मान्यता का सबसे बड़ा असर हमारी जमीनी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। 'वोकल फॉर लोकल' (Vocal for Local) की गूंज अब अंतरराष्ट्रीय होगी। दिवाली पर मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार (Potters), कांदील बनाने वाले कारीगर, और पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प को नया जीवन मिलेगा।
जब दुनिया की नज़र भारत पर होगी, तो प्लास्टिक के चाइनीज सामान की जगह मिट्टी के दीयों और हाथ से बनी सजावट की मांग बढ़ेगी। यह हमारे कुटीर उद्योगों (Cottage Industries) के लिए आर्थिक उन्नति का द्वार खोलेगा।
पर्यावरण और जिम्मेदारी: भविष्य की दिवाली
UNESCO का टैग मिलने के साथ ही हम पर एक बड़ी जिम्मेदारी भी आ गई है—इस त्योहार को सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) बनाए रखने की। अक्सर पटाखों के धुएं और शोर के कारण दिवाली की आलोचना होती रही है।
अब हमें दुनिया को दिखाना होगा कि हम जश्न मनाना भी जानते हैं और प्रकृति की रक्षा करना भी।
- ग्रीन क्रैकर्स: कम प्रदूषण वाले पटाखों का उपयोग।
- मिट्टी के दीये: बिजली की झालरों की जगह तेल/घी के दीयों का प्रयोग, जो न केवल सुंदर हैं बल्कि प्रदूषण रहित भी।
- वेस्ट मैनेजमेंट: त्योहार के अगले दिन साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना।
दिवाली: एक ग्लोबल फेस्टिवल
आज दिवाली न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर से लेकर लंदन के ट्राफलगर स्क्वायर तक मनाई जाती है। व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा दीया जलाना हो या दुबई के बुर्ज खलीफा पर दिवाली की रोशनी, यह त्योहार सीमाओं को लांघ चुका है। UNESCO की मुहर ने इस बात पर आधिकारिक पुष्टि कर दी है कि भारतीय डायस्पोरा (प्रवासी भारतीय) ने अपनी संस्कृति को विदेशों में भी जीवित रखा है।
निष्कर्ष: एक नई शुरुआत
UNESCO द्वारा दिवाली को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल करना प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का विषय है। यह सम्मान हमारे पूर्वजों, हमारी परंपराओं और हमारे संस्कारों का सम्मान है।
लेकिन याद रखें, विरासत को सिर्फ सहेजना नहीं होता, उसे जीना होता है। आइए संकल्प लें कि अगली दिवाली हम और अधिक उत्साह, प्रेम और जिम्मेदारी के साथ मनाएंगे। एक ऐसी दिवाली, जहाँ किसी गरीब के घर भी उजाला हो, जहाँ पर्यावरण को नुकसान न हो, और जहाँ हम सही मायनों में अज्ञानता के अंधेरे को ज्ञान के प्रकाश से मिटा सकें।
सभी देशवासियों को इस ऐतिहासिक उपलब्धि की हार्दिक बधाई!
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. UNESCO लिस्ट में शामिल होने से आम आदमी को क्या फायदा होगा?
सबसे बड़ा फायदा है 'ग्लोबल पहचान'। अब दुनिया भर के पर्यटक दिवाली देखने भारत आएंगे, जिससे हमारे टूरिज्म और दुकानदार भाइयों की कमाई बढ़ेगी। साथ ही, हमारी संस्कृति को अब पूरी दुनिया सम्मान की नज़र से देखेगी।
Q2. क्या अब दिवाली पर पूरी दुनिया में छुट्टी (Holiday) होगी?
नहीं, UNESCO सांस्कृतिक विरासत की मान्यता देता है, यह सरकारी छुट्टी तय नहीं करता। लेकिन हाँ, अब विदेशों में (जैसे अमेरिका, लंदन) दिवाली का जश्न और बड़े स्तर पर मनाया जाएगा और हो सकता है भविष्य में कुछ देश इसे स्कूल हॉलिडे घोषित कर दें।
Q3. क्या दिवाली से पहले भी भारत का कोई त्योहार इस लिस्ट में है?
जी हाँ! दिवाली से पहले कोलकाता की 'दुर्गा पूजा' और हमारा 'कुंभ मेला' भी UNESCO की इस प्रतिष्ठित लिस्ट में अपनी जगह बना चुके हैं। यह भारत की सांस्कृतिक ताकत का सबूत है।
Q4. यह फैसला कब लिया गया?
यह ऐतिहासिक फैसला 10 दिसंबर 2025 को UNESCO की बैठक के दौरान लिया गया।

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