सनातन धर्म की रक्षा करना हमारा प्रथम अधिकार है
भारत केवल एक भू-भाग नहीं है, यह एक संस्कृति, चेतना और निरंतर प्रवाहित होती सभ्यता है। हजारों वर्षों से इस भूमि ने विश्व को धर्म, दर्शन, सहिष्णुता और मानवता का मार्ग दिखाया है। इसी शाश्वत परंपरा को हम सनातन धर्म कहते हैं।
सनातन धर्म किसी एक पंथ, व्यक्ति या संगठन तक सीमित नहीं है। यह जीवन जीने की एक पद्धति है — जहाँ कर्तव्य, करुणा, संयम और सत्य सर्वोपरि हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या इस धर्म की रक्षा करना हमारा अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य है?
सनातन धर्म का अर्थ और उसकी व्यापकता
‘सनातन’ का अर्थ है — जो न कभी आरंभ हुआ, न कभी समाप्त होगा। यह धर्म समय के साथ बदला नहीं, बल्कि समय को दिशा देता रहा। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, गीता — ये सभी केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि मानवता के लिए मार्गदर्शक दीप हैं।
सनातन धर्म ने कभी बलपूर्वक किसी को नहीं बदला, बल्कि विचार और विवेक से जोड़ा। यही कारण है कि भारत में विविधता होते हुए भी एकता बनी रही।
शिक्षा केवल जानकारी नहीं, संस्कार भी है
आज की शिक्षा प्रणाली बच्चों को डिग्री तो देती है, लेकिन प्रश्न यह है — क्या वह संस्कार भी दे पा रही है?
विद्यालय वह स्थान है जहाँ बच्चे केवल गणित या विज्ञान नहीं सीखते, बल्कि जीवन के मूल मूल्य भी ग्रहण करते हैं। यदि शिक्षा से संस्कृति को अलग कर दिया जाए, तो वह केवल मशीन तैयार करती है — मानव नहीं।
भगवा रंग का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व
भगवा रंग त्याग, तपस्या, साहस और राष्ट्र के प्रति समर्पण का प्रतीक है। यह रंग किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का रंग है।
प्राचीन काल से ऋषि-मुनि, संत, और राष्ट्र के लिए बलिदान देने वाले महापुरुष भगवा धारण करते आए हैं। यदि भारतीय विद्यालयों की वर्दी में भगवा रंग का समावेश हो, तो वह बच्चों के मन में कर्तव्य और त्याग की भावना को जन्म दे सकता है।
यह किसी पर थोपा गया विचार नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक स्मरण है — कि हम कौन हैं और हमारी जड़ें कहाँ हैं।
वंदे मातरम् और राष्ट्रीय चेतना
“वंदे मातरम्” केवल एक गीत नहीं, यह उस भावना की अभिव्यक्ति है, जहाँ मातृभूमि को माँ का स्थान दिया गया है।
यदि विद्यालयों में प्रतिदिन वंदे मातरम् के साथ राष्ट्रीय प्रेरणा से जुड़े गीत गाए जाएँ, तो बच्चों में स्वाभाविक रूप से देश के प्रति सम्मान विकसित होगा।
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह किसी के विश्वास के विरुद्ध नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता का भाव है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और राष्ट्र निर्माण का विचार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपने आरंभ से ही चरित्र निर्माण, सामाजिक समरसता और राष्ट्र सेवा पर बल दिया है।
संघ का उद्देश्य सत्ता नहीं, बल्कि समाज को सशक्त बनाना रहा है। यदि विद्यालयों में राष्ट्रभक्ति से जुड़े सकारात्मक विचार बच्चों तक पहुँचें, तो वह एक जागरूक पीढ़ी का निर्माण कर सकते हैं।
सनातन धर्म की रक्षा करने वाले महापुरुष
भारत का इतिहास ऐसे असंख्य महापुरुषों से भरा पड़ा है जिन्होंने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।
- भगवान श्रीराम – मर्यादा और कर्तव्य का आदर्श
- श्रीकृष्ण – धर्म, नीति और विवेक का संतुलन
- महर्षि वेदव्यास – ज्ञान का संरक्षण
- आदि शंकराचार्य – सनातन दर्शन का पुनर्जागरण
- छत्रपति शिवाजी महाराज – स्वराज और धर्म रक्षा
- गुरु गोविंद सिंह – धर्म और साहस का संगम
इसी परंपरा में गौ-रक्षा, प्रकृति संरक्षण और समाज सेवा को धर्म का अभिन्न अंग माना गया।
आधुनिक भारत और नेतृत्व की भूमिका
आज के भारत में नेतृत्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री अक्सर भारत की सांस्कृतिक विरासत, योग, आयुष और भारतीय मूल्यों की वैश्विक पहचान की बात करते रहे हैं।
यह संकेत करता है कि आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं।
विचार थोपना नहीं, चिंतन जगाना उद्देश्य
यह लेख किसी पर विचार थोपने का प्रयास नहीं है। न ही इसका उद्देश्य किसी को आहत करना है।
उद्देश्य केवल इतना है कि हम अपने अतीत, अपनी जड़ों और अपने मूल्यों पर एक बार ठहरकर सोचें।
यदि हम स्वयं अपनी संस्कृति को नहीं जानेंगे, तो आने वाली पीढ़ी को क्या सौंप पाएँगे?
निष्कर्ष
सनातन धर्म की रक्षा करना किसी के विरुद्ध खड़ा होना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को समझना है।
शिक्षा में संस्कार, वर्दी में अर्थ, और प्रार्थना में राष्ट्र — यदि यह सब संतुलित रूप से हो, तो भारत न केवल आर्थिक, बल्कि नैतिक रूप से भी विश्वगुरु बन सकता है।
भारतीय सनातन संस्कृति अमर है, और उसका संरक्षण हमारा अधिकार ही नहीं, हमारा कर्तव्य भी है।
जय भारत। सनातन धर्म की जय।



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