प्रलय क्या है? विनाश या नई शुरुआत का संकेत
जब भी हम प्रलय शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में एक भयानक दृश्य उभरता है – चारों ओर तबाही, बाढ़, आग, अंधकार और सन्नाटा। लेकिन हिन्दू दर्शन के अनुसार प्रलय केवल विनाश नहीं, बल्कि नई सृष्टि की भूमिका है।
आज के समय में जब जलवायु परिवर्तन, युद्ध, महामारी और प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ रही हैं, तो प्रलय की अवधारणा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि समसामयिक और चेतावनी देने वाली बन चुकी है।
प्रलय का शाब्दिक अर्थ
संस्कृत शब्द “प्रलय” का अर्थ होता है – पूर्ण रूप से लय हो जाना, समाप्त हो जाना या मूल तत्वों में विलीन होना।
हिन्दू दर्शन में यह माना गया है कि सृष्टि न तो स्थायी है और न ही अनंत। यह एक चक्र है – सृजन → पालन → विनाश → पुनः सृजन।
हिन्दू धर्म में प्रलय की अवधारणा
हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मांड अनंत चक्रों में चलता है। हर चक्र के अंत में जब संतुलन बिगड़ जाता है, तब प्रलय होता है।
यह प्रलय ईश्वर का क्रोध नहीं, बल्कि संतुलन बहाल करने की प्रक्रिया है।
प्रलय के प्रमुख प्रकार
1. नित्य प्रलय
यह प्रतिदिन होने वाला सूक्ष्म प्रलय है। हर जीव की मृत्यु को नित्य प्रलय कहा जाता है।
2. नैमित्तिक प्रलय
एक कल्प के अंत में होने वाला प्रलय, जब ब्रह्मा का एक दिन समाप्त होता है।
3. प्राकृतिक प्रलय
बाढ़, भूकंप, ज्वालामुखी, सुनामी, महामारी – ये सभी प्राकृतिक प्रलय के संकेत माने जाते हैं।
4. आत्यंतिक प्रलय
जब आत्मा जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है। इसे मोक्ष से जोड़ा जाता है।
प्रलय और भगवान शिव का संबंध
प्रलय को अक्सर भगवान शिव के तांडव से जोड़ा जाता है। तांडव नृत्य केवल विनाश का नहीं, बल्कि अज्ञान के अंत का प्रतीक है।
जब अधर्म बढ़ता है, प्रकृति का शोषण होता है और मानव अहंकार में डूब जाता है, तब प्रलय का मार्ग प्रशस्त होता है।
प्रलय और भगवान विष्णु की भूमिका
शास्त्रों के अनुसार प्रलय के समय भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। सृष्टि का बीज उनके भीतर सुरक्षित रहता है।
प्रलय के बाद नई सृष्टि की रचना फिर से आरंभ होती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रलय
आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि पृथ्वी और ब्रह्मांड स्थायी नहीं हैं।
- ग्लोबल वार्मिंग
- पोल शिफ्ट
- एस्टेरॉयड टकराव
- सूर्य का रेड जायंट बनना
ये सभी वैज्ञानिक घटनाएँ किसी न किसी रूप में प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न कर सकती हैं।
आज के समय में प्रलय के संकेत
आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, वहाँ प्रलय के संकेत स्पष्ट दिखते हैं:
- अत्यधिक गर्मी और बाढ़
- भूकंप और सुनामी
- महामारियाँ
- युद्ध और परमाणु खतरा
ये सभी संकेत बताते हैं कि मानव ने प्रकृति के साथ संतुलन बिगाड़ दिया है।
प्रलय का मानव समाज पर प्रभाव
प्रलय केवल भौतिक विनाश नहीं लाता, यह मानव को आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है।
इतिहास गवाह है कि हर बड़ी तबाही के बाद मानव समाज ने खुद को बदला है।
प्रलय से सीख
प्रलय हमें सिखाता है कि:
- अहंकार विनाश की जड़ है
- प्रकृति का सम्मान जरूरी है
- संतुलन ही जीवन है
- अंत हमेशा नई शुरुआत लाता है
क्या प्रलय रोकी जा सकती है?
पूर्ण प्रलय को रोका नहीं जा सकता, लेकिन मानव जनित विनाश को जरूर रोका जा सकता है।
यदि मानव:
- प्रकृति का सम्मान करे
- युद्ध और हिंसा छोड़े
- संतुलित जीवन जिए
तो प्रलय को टाला नहीं, पर ट्रिगर होने से रोका जा सकता है।
निष्कर्ष
प्रलय कोई डराने वाली कहानी नहीं, बल्कि एक चेतावनी और अवसर है।
यह हमें बताता है कि जो नष्ट होता है, वह व्यर्थ नहीं जाता – वहीं से एक नई शुरुआत जन्म लेती है।
यदि मानव समय रहते नहीं संभला, तो प्रलय केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रहेगी।
लेखक: Mr. Manoj Jarwal
विशेष लेख | धर्म, समाज और समकालीन दृष्टिकोण

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