आंसू गैस, लाठियां और सिसकती खेती: हनुमानगढ़ में एथेनॉल फैक्ट्री पर क्यों छिड़ी है आर-पार की जंग?
हनुमानगढ़ जिले का टिब्बी क्षेत्र... वो इलाका, जो अपनी हरियाली और नहरों के पानी के लिए जाना जाता है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से यहाँ की फिजाओं में फसलों की महक नहीं, बल्कि आंसू गैस के गोले और बारूद की गंध घुली हुई है।
सड़कों पर बिखरे हुए जूते-चप्पल, टूटी हुई लाठियां और बैरिकेड्स गवाही दे रहे हैं कि यहाँ कुछ बहुत गलत हुआ है। जिस किसान को 'अन्नदाता' कहा जाता है, आज उसे अपनी ही जमीन और पानी को बचाने के लिए 'उपद्रवी' का टैग झेलना पड़ रहा है।
सवाल सिर्फ एक एथेनॉल फैक्ट्री का नहीं है। सवाल उस भरोसे का है जो प्रशासन और जनता के बीच टूट चुका है। आखिर क्यों हनुमानगढ़ का किसान मरने-मारने पर उतारू है? क्या वाकई यह विकास है, या विनाश की आहट?
- रामलाल (70 वर्षीय किसान, टिब्बी)
विवाद की जड़: अनाज आधारित एथेनॉल फैक्ट्री
मामला हनुमानगढ़ जिले की टिब्बी तहसील का है, जहाँ एक निजी कंपनी द्वारा अनाज आधारित एथेनॉल (Ethanol) फैक्ट्री लगाई जा रही है। सरकार का तर्क है कि इससे क्षेत्र में रोजगार आएगा और किसानों के अनाज (मक्का, चावल) की खपत बढ़ेगी, जिससे उन्हें अच्छे दाम मिलेंगे। सुनने में यह एक बेहतरीन "ग्रीन एनर्जी" प्रोजेक्ट लगता है।
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू वो है, जिसे किसान पिछले एक साल से सरकार को समझाने की कोशिश कर रहे हैं। किसानों का आरोप है कि यह फैक्ट्री हर दिन लाखों लीटर पानी जमीन से खींचेगी।
किसानों का गणित, जो सरकार को समझ नहीं आ रहा
टिब्बी और आसपास का इलाका पहले से ही 'डार्क जोन' की तरफ बढ़ रहा है। इंदिरा गांधी नहर परियोजना होने के बावजूद, भूजल स्तर (Ground Water Level) लगातार नीचे जा रहा है। किसानों का सीधा तर्क है:
- पानी की खपत: एथेनॉल बनाने की प्रक्रिया में भारी मात्रा में पानी लगता है। किसानों को डर है कि फैक्ट्री लगने के बाद उनके नलकूप सूख जाएंगे।
- रासायनिक प्रदूषण: फैक्ट्री से निकलने वाला अपशिष्ट (Chemical Waste) अगर जमीन में गया, तो बची-कुची उपजाऊ मिट्टी भी बंजर हो जाएगी।
- पशुधन पर खतरा: प्रदूषित हवा और पानी का सीधा असर दुधारू पशुओं पर पड़ेगा, जो यहाँ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
वह काली रात: जब शांत आंदोलन उग्र हो गया
पिछले कई महीनों से किसान शांतिपूर्ण तरीके से टेंट लगाकर बैठे थे। गांधीवादी तरीके से भजन गाए जा रहे थे, रघुपति राघव राजा राम की धुन बज रही थी। लेकिन प्रशासन का धैर्य जवाब दे गया।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, पुलिस बल ने रातों-रात धरना स्थल को खाली कराने की कोशिश की। जब किसानों ने विरोध किया, तो लाठियां भांजी गईं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में बुजुर्ग किसानों और महिलाओं को पुलिस की कार्रवाई का सामना करते देखा जा सकता है। इसी घटना ने आग में घी का काम किया।
"हम सो रहे थे जब पुलिस आई। उन्होंने बात नहीं की, सीधा डंडे बरसाए। क्या अपना हक़ मांगना गुनाह है इस देश में?" — एक महिला प्रदर्शनकारी
प्रशासन का पक्ष: 'कानून हाथ में लेने की इजाज़त नहीं'
जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने बहुत संयम से काम लिया। उनका आरोप है कि आंदोलन में कुछ असामाजिक तत्व घुस आए थे जिन्होंने पुलिस पर पथराव किया, जिसके बाद आत्मरक्षा में हल्का बल प्रयोग करना पड़ा।
प्रशासन का यह भी तर्क है कि फैक्ट्री के पास सभी कानूनी मंजूरियां (Environmental Clearance) हैं और इससे प्रदूषण का खतरा नहीं है। लेकिन किसान पूछ रहे हैं— "अगर सब सही है, तो जन-सुनवाई (Public Hearing) में हमें क्यों नहीं बुलाया गया? रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?"
सियासत गर्म: पक्ष-विपक्ष आमने-सामने
हनुमानगढ़ की लपटें अब जयपुर तक पहुँच चुकी हैं। विधानसभा में भी इस मुद्दे की गूंज सुनाई दे रही है।
- विपक्ष का हमला: विपक्षी नेताओं ने सरकार पर "कॉरपोरेट दलाली" करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सरकार चंद उद्योगपतियों के मुनाफे के लिए हजारों किसानों की बलि दे रही है।
- किसान संगठनों की लामबंदी: अब यह मुद्दा सिर्फ टिब्बी का नहीं रहा। पंजाब और हरियाणा के बड़े किसान नेताओं ने भी हनुमानगढ़ कूच करने का ऐलान कर दिया है। 'संयुक्त किसान मोर्चा' ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की चेतावनी दी है।
आगे क्या? सुलह या संघर्ष?
फिलहाल स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है। प्रशासन ने धारा 144 लगा रखी है और इंटरनेट बंद है ताकि अफवाहें न फैलें। लेकिन संवादहीनता (Lack of Communication) ने खाई को और गहरा कर दिया है।
किसानों की मांगें साफ़ हैं:
1. फैक्ट्री का निर्माण तुरंत रोका जाए।
2. गिरफ्तार किए गए किसान साथियों को बिना शर्त रिहा किया जाए।
3. लाठीचार्ज के दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हो।
InfoZind का नज़रिया
विकास जरूरी है, लेकिन उसकी कीमत क्या होनी चाहिए? जब हम 'सस्टेनेबल डेवलपमेंट' की बात करते हैं, तो उसमें स्थानीय समुदाय की सहमति सबसे ऊपर होनी चाहिए। हनुमानगढ़ का किसान विकास विरोधी नहीं है, वह बस अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी बचाना चाहता है।
सरकार को चाहिए कि पुलिस के डंडे के जोर पर नहीं, बल्कि टेबल पर बैठकर, पारदर्शी तरीके से वैज्ञानिक तथ्यों के साथ किसानों की शंकाओं का समाधान करे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
हनुमानगढ़ किसान आंदोलन का मुख्य कारण क्या है?
इस आंदोलन की मुख्य वजह हनुमानगढ़ के टिब्बी क्षेत्र में बन रही एक एथेनॉल फैक्ट्री है। किसानों का आरोप है कि यह फैक्ट्री भारी मात्रा में भूजल (Ground Water) का दोहन करेगी, जिससे खेती के लिए पानी नहीं बचेगा और इलाका बंजर हो जाएगा।
क्या एथेनॉल फैक्ट्री से पर्यावरण को नुकसान होगा?
किसानों और पर्यावरणविदों का मानना है कि फैक्ट्री से निकलने वाले अपशिष्ट (Chemical Waste) से मिट्टी और हवा प्रदूषित होगी। चूँकि यह इलाका पहले से ही 'डार्क ज़ोन' (पानी की कमी वाला) है, इसलिए फैक्ट्री लगने से जल संकट गहरा सकता है।
हनुमानगढ़ में इंटरनेट सेवाएं क्यों बंद की गई हैं?
किसान आंदोलन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज और झड़प के बाद तनाव बढ़ गया था। अफवाहों को फैलने से रोकने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिला प्रशासन ने एहतियातन इंटरनेट सेवाओं पर अस्थायी रोक लगाई है।
टिब्बी के किसानों की प्रमुख मांगें क्या हैं?
किसानों की तीन मुख्य मांगें हैं: 1. एथेनॉल फैक्ट्री का निर्माण तुरंत रोका जाए, 2. पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए किसानों को बिना शर्त रिहा किया जाए, और 3. लाठीचार्ज के दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हो।
यह मामला इतना तूल क्यों पकड़ रहा है?
शुरुआत में यह स्थानीय मुद्दा था, लेकिन पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज के वीडियो वायरल होने के बाद पंजाब, हरियाणा और पूरे राजस्थान के किसान संगठन इसके समर्थन में आ गए हैं, जिससे यह एक बड़ा सियासी मुद्दा बन गया है।
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